धानापुर की मजार में मरणासन्न मिली नजमा को 50 दिन बाद भी इंसाफ नहीं, चंदौली में आरोपी बेखौफ; दहशत में परिवार
15 दिनों तक कोमा में जिंदगी की जंग लड़ने वाली नजमा ने होश में आने के बाद पुलिस को कथित हमलावर का नाम बताया। इसके बावजूद 50 दिन बाद भी आरोपी की गिरफ्तारी नहीं होने का परिजनों का आरोप गंभीर सवाल खड़े करता है। अब परिवार को आश्वासन नहीं, बल्कि निष्पक्ष जांच, सुरक्षा और कार्रवाई का स्पष्ट जवाब चाहिए। न्याय में देरी से पीड़ित परिवार का भरोसा कमजोर नहीं पड़ना चाहिए।

धानापुर (चंदौली)। जिंदगी और मौत के बीच 15 दिनों तक संघर्ष करने के बाद होश में लौटी 18 वर्षीय नजमा को अब इंसाफ का इंतजार है। 17 सितंबर को धानापुर स्थित एक मजार के अंदर वह मरणासन्न हालत में मिली थी। गंभीर हालत में अस्पताल पहुंचाई गई नजमा करीब 15 दिनों तक कोमा में रही। इसके बाद जब उसे होश आया तो उसने पुलिस के सामने अपना बयान दर्ज कराया और कथित हमलावर का नाम बताया। लेकिन घटना के करीब 50 दिन गुजर जाने के बाद भी आरोपी की गिरफ्तारी नहीं होने का आरोप पीड़िता के परिजनों ने लगाया है।
परिजनों के मुताबिक, इस घटना ने पूरे परिवार को भय और असुरक्षा के माहौल में धकेल दिया है। बेटी के साथ हुई घटना के बाद से माता-पिता उसकी सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं। परिवार का कहना है कि जब पीड़िता ने होश में आने के बाद पुलिस को कथित हमलावर के बारे में जानकारी दी, तब उन्हें उम्मीद जगी थी कि जल्द ही आरोपी कानून की गिरफ्त में होगा और उन्हें न्याय मिलेगा। लेकिन लंबा समय गुजरने के बावजूद गिरफ्तारी नहीं होने से उनकी चिंता लगातार बढ़ रही है।
बयान के बाद भी गिरफ्तारी का इंतजार
इस मामले में सबसे अहम पहलू पीड़िता का बयान है। परिजनों का दावा है कि नजमा ने पुलिस को घटना में शामिल व्यक्ति की पहचान बताई थी। इसके बाद संबंधित व्यक्ति को पुलिस के साथ ले जाए जाने की चर्चा भी सामने आई थी, लेकिन तत्कालीन थाना प्रभारी सूर्यप्रकाश मिश्रा ने उसकी गिरफ्तारी से इनकार किया था। ऐसे में पुलिस की आधिकारिक कार्रवाई और स्थानीय स्तर पर सामने आए दावों के बीच स्थिति स्पष्ट होना जरूरी है।
परिवार के मन में एक ही सवाल—बेटी को न्याय कब?
पीड़िता के माता-पिता का कहना है कि बेटी के साथ हुई घटना ने उनकी जिंदगी बदल दी है। उन्हें अपनी बेटी की सुरक्षा के साथ-साथ भविष्य की चिंता भी सता रही है। परिवार चाहता है कि मामले की निष्पक्ष जांच हो, पीड़िता के बयान और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर कार्रवाई आगे बढ़े तथा आरोपी को जल्द कानून के दायरे में लाया जाए।
परिजनों की मांग है कि पुलिस उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करे, ताकि वे किसी भय या दबाव के बिना न्याय की लड़ाई लड़ सकें। उनका कहना है कि न्याय मांगने के लिए उन्हें बार-बार अधिकारियों के सामने अपनी पीड़ा न दोहरानी पड़े।
पुलिस के सामने जवाबदेही का सवाल
मामले में पहले भी पुलिस की कार्रवाई को लेकर सवाल उठ चुके हैं। पीड़िता के पिता मोहम्मद यूनुस शाह ने पुलिस अधीक्षक से गुहार लगाई थी। परिवार ने कार्रवाई में देरी पर सवाल उठाए थे। स्थानीय लोगों ने दावा किया था कि पुलिस एक व्यक्ति को अपने साथ ले गई थी, जबकि तत्कालीन थाना प्रभारी ने गिरफ्तारी से इनकार किया था।
ऐसे में अब क्षेत्राधिकारी सकलडीहा और पुलिस अधीक्षक से यह अपेक्षा है कि वे मामले की मौजूदा स्थिति सार्वजनिक करें। आखिर पीड़िता के बयान के आधार पर जांच कहां तक पहुंची? क्या संदिग्ध से पूछताछ हुई? आरोपी की गिरफ्तारी क्यों नहीं हो सकी? पीड़ित परिवार की सुरक्षा के लिए क्या इंतजाम किए गए हैं?
अब न्याय के साथ सुरक्षा भी जरूरी
नजमा का 15 दिनों तक कोमा में रहना और फिर जिंदगी की जंग जीतकर लौटना अपने आप में बेहद कठिन संघर्ष रहा है। लेकिन किसी पीड़िता का बच जाना ही न्याय की मंजिल नहीं हो सकती। उसे सुरक्षित माहौल, निष्पक्ष जांच और कानून के तहत न्याय मिलना भी उतना ही जरूरी है।
परिवार की मांग है कि पुलिस मामले को गंभीरता से लेते हुए शीघ्र कार्रवाई करे। यदि किसी निर्दोष व्यक्ति का नाम सामने आया है तो जांच में यह भी स्पष्ट किया जाए और यदि साक्ष्य किसी की संलिप्तता की पुष्टि करते हैं तो उसके खिलाफ कानून के मुताबिक कार्रवाई हो।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि 17 सितंबर की घटना के करीब 50 दिन बाद भी नजमा और उसके परिवार को न्याय के लिए इंतजार क्यों करना पड़ रहा है? आखिर सीओ साहब, पीड़िता के बयान और परिवार की गुहार के बाद पुलिस की अगली कार्रवाई कब दिखाई देगी?