प्राइवेट स्कूल और अस्पताल लूट का अड्डा बन चुके हैं—शिक्षा व स्वास्थ्य बिजनेस नहीं, सबका हक हैं- पिंटू पाल

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अमीर-गरीब एक छत के नीचे आएं, तो सरकारी संस्थान चमक उठेंगे

चंदौली के सकलडीहा सेक्टर-1 से जिला पंचायत सदस्य प्रत्याशी व किसान नेता पिंटू पाल ने शिक्षा-स्वास्थ्य पर करारा प्रहार किया। उन्होंने कहा, “अमीर-गरीब के बच्चे एक ही स्कूल में पढ़ें, तो सरकारी स्कूल खुद-ब-खुद उत्कृष्ट हो जाएंगे। एक ही अस्पताल में इलाज हो, तो सरकारी हॉस्पिटल जगमगा उठेंगे।” ये सेवाएं व्यापार का धंधा नहीं, हर नागरिक का मौलिक अधिकार हैं।




फोटो: पिंटू पाल 



शिक्षा में लूट का काला साया
भारत में 25 लाख से अधिक प्राइवेट स्कूल कुल नामांकन का 40% संभालते हैं, लेकिन फीस ₹50,000 से ₹2 लाख सालाना तक पहुंच गई है। NSSO 2023 सर्वे बताता है कि 70% परिवार आय का 20-30% पढ़ाई पर उड़ा देते हैं, जबकि 25 करोड़ बच्चे सरकारी स्कूलों पर निर्भर हैं जहां शिक्षक-छात्र अनुपात 1:35 है। फिनलैंड की तरह सभी को समान मुफ्त शिक्षा दें, तो दबाव से सुधार तेज होगा—PISA में वे नंबर-1 हैं।


स्वास्थ्य सेवाओं पर मुनाफे की मार
प्राइवेट अस्पतालों का कारोबार ₹10 लाख करोड़ का हो चुका है; NITI आयोग 2024 रिपोर्ट के अनुसार 60% भारतीय इन्हें चुनते हैं, जहां खर्च सरकारी से 5-10 गुना ज्यादा है।साधारण अपेंडिक्स ऑपरेशन सरकारी में ₹5,000 का, प्राइवेट में ₹1 लाख। WHO डेटा चीख-चीखकर बताता है—हर साल 5 लाख मौतें मेडिकल खर्च से। UK के NHS जैसी मुफ्त सार्वजनिक सेवा से जीवन प्रत्याशा 81 वर्ष हो जाती (भारत में 70)।


समाधान का स्पष्ट रास्ता
प्राइवेटकरण ने असमानता को हवा दी—1947 के ग्राम स्वराज सपने को टाटा-रिलायंस जैसे कॉरपोरेट ने भुनाया। रवांडा ने प्राइवेट सीमित कर सरकारी सिस्टम मजबूत किया, स्वास्थ्य कवरेज 10% से 95% पहुंचा। पिंटू पाल जैसे नेता सड़कों पर सवाल उठा रहे हैं। नीतिनिर्माताओं, जागो। अमीर-गरीब की एक राह से भारत चमकेगा—फैसला आपका।

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