आज फिर ताजा हुई धानापुर की यादें

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रणबांकुरो ने थाने पर चढ़कर फहराया था तिरंगा 

इंग्लैंड की पार्लियामेंट में धानापुर थाना काण्ड की उठी थी आवाज 

चंदौली,16 अगस्त 1942 को धानापुर थाना फूंकने में जिन क्रांतिकारियों ने अपने को बलिदान कर दिया आज उनकी शहादत को बलिदान दिवस के रुप में मनाया गया। इन रणबांकुरो ने आजादी के पांच वर्ष पहले ही इसी दिन को धानापुर को दस दिनों तक आजाद रखा। इस दौरान हीरा सिंह, महंगू सिंह,और रघुनाथ सिंह शहीद हो गए। जबकि दर्जनों अन्य क्रांतिकारी वीर गंभीर रूप से घायल हो गए। 



ज्ञातव्य है कि ब्रिटिश हुकूमत ने देश को इतना मजबूर कर दिया कि आज़ादी की क्रांति लानी पड़ी। उसी दौर में आक्रोशित भारत माता के मतवालों ने थाने का गेट तोड़ते हुए अंदर घुस गए और थानाध्यक्ष अनवर उल हक सहित दो पुलिस कर्मियों को मौत के घाट उतरते हुए आग के हवाले कर दिया। इस गोलीबारी में कुल 8 लोग घायल हुए थे, जिसमें हीरा सिंह, रघुनाथ सिंह और महंगू सिंह तीन लोग शहीद भी हो गए।इन अमर बलिदानियों की स्मृति में हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी 16 अगस्त को शहीद स्मारक स्थल पर “बलिदान दिवस” मनाया गया।


इतिहास के भूले-बिसरे पन्नों में दबा धानापुर का स्वर्णिम अध्याय 

चौरी चौरा और काकोरी कांड की तरह धानापुर कांड को इतिहास के पन्नों में वह स्थान नहीं मिला, जो मिलना चाहिए था, लेकिन इसकी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्ता किसी भी तरह से कम नहीं हुई है। यह वही स्थान है जहां आजादी से पांच साल पहले, 16 अगस्त 1942 को, उत्तर प्रदेश के चंदौली जनपद के धानापुर में स्वतंत्रता सेनानियों ने अंग्रेजों के सामने पहली बार तिरंगा फहराया था, और ब्रिटिश हुकूमत देखते रह गई।

भारत देश को आजाद हुए 78 साल बीत चुके हैं, और इस 15 अगस्त को हम अपनी आजादी की 78वीं वर्षगांठ मना रहे हैं। इस आजादी की नींव में लाखों स्वतंत्रता सेनानियों का बलिदान शामिल है, जिन्होंने अपनी जान की बाजी लगाई, घर-बार छोड़ा, और ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ विद्रोह का नेतृत्व किया। अंग्रेजों की नजर में यह क्रांतिकारी “अपराधी” थे, लेकिन इन्हीं अपराधों की वजह से आज हम सभी स्वतंत्र हैं।

आजादी के क्रांति में धानापुर में शहीद हुए थे तीन जवान,धानापुर में पहली बार लहराया तिरंगा



1922 में महात्मा गांधी द्वारा असहयोग आंदोलन के थमने के बाद भी चंदौली के धानापुर में क्रांतिकारियों का उत्साह चरम पर था। 16 अगस्त 1942 को सैकड़ों स्वतंत्रता सेनानी धानापुर थाने को घेरने पहुंच गए, और तिरंगा फहराने की मांग करने लगे। वहां तैनात तत्कालीन अंग्रेज दरोगा अनवारुल हक ने तिरंगा फहराने से इनकार कर दिया, जिसके बाद स्थिति बिगड़ गई।दरोगा ने गोलियां चलवा दी, जिसमें हीरा सिंह की मौके पर ही मृत्यु हो गई और छह लोग घायल हो गए। महंगू सिंह की रास्ते में और रघुनाथ सिंह की अस्पताल में मृत्यु हो गई। तीन अन्य घायल सत्यनारायण, रामसिंह, और सीताराम का भी लंबे समय तक इलाज चला। इसके बावजूद, शिवमंगल यादव ने थाना भवन पर चढ़कर तिरंगा फहरा दिया।

धानापुर थाना काण्ड क्रांतिकारियों का प्रतिशोध बना 

इस घटना से क्रांतिकारियों का गुस्सा और भड़क गया। बताया जाता है कि उन्होंने थाने में घुसे दरोगा सहित तीन सिपाहियों को घेर कर जिंदा जला दिया। इस घटना ने पूरे ब्रिटिश साम्राज्य में हलचल मचा दी थी। धानापुर थाना के पास ही शहीद स्मारक बनाया गया है, और हर साल 16 अगस्त को यहाँ क्रांति दिवस के रूप में मनाया जाता है।

स्वतंत्रता सेनानी डॉ. रामदेव शर्मा के पुत्र डॉ. नरेंद्र देव शर्मा बताते हैं कि महात्मा गांधी के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ से प्रेरित होकर क्षेत्र के रणबांकुरे भारत माता की बेड़ियों को तोड़ने के लिए आतुर हो गए थे। कामता प्रसाद विद्यार्थी के नेतृत्व में, इन आजादी के दीवानों ने 10 अगस्त 1942 को गुरेहूँ में बंदोबस्ती के अभिलेख जला दिए थे। 16 अगस्त को धानापुर थाने पर तिरंगा फहराने का निर्णय लिया गया, और क्रांतिकारी शांतिपूर्ण तरीके से तिरंगा लेकर थाने पर पहुंचे।

16 क्रांतिकारियों आजीवन कारावास और 136 लोगों पर मुकदमा, कठोर सजा

इस घटना के बाद, 136 लोगों पर नामजद मुकदमा दर्ज हुआ। इनमें से 16 को आजीवन कारावास, 28 को 10 साल की सजा, 7 को सात साल की सजा, और एक व्यक्ति को 5 साल की सजा सुनाई गई। धानापुर कांड आज भी उन वीर स्वतंत्रता सेनानियों की याद दिलाता है, जिन्होंने भारत की आजादी के लिए अपने प्राणों की आहुति दी।आजादी के अमरत्वता पाए दीवानों के शौर्य गाथा को कुछ कभी भुलाया नहीं जा सकता है। उनकी याद में 16अगस्त को याद कर उनकी शहादत को सलाम किया जाता रहेगा।

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