जिले में बिना रजिस्ट्रेशन के चल रहे हजारों क्लीनिक, मेडिकल स्टोर, नरसिंह होम, पैथोलॉजी
इनमें बैठने वाले चिकित्सक हाईस्कूल या इंटरमीडिएट हैं
चंदौली,शहाबगंज। स्थित आस्था क्लिनिक में शुक्रवार की रात प्रसव के दौरान जच्चा-बच्चा की मौत हो गई. घटना के बाद गुस्साए परिजनों ने अस्पताल प्रशासन पर लापरवाही का आरोप लगाते हुए जमकर हंगामा किया. स्थिति बिगड़ती देख अस्पताल की संचालिका मौके से फरार हो गई. हंगामे की सूचना पर सीओ ने इलिया और चकिया थाने की पुलिस फोर्स के साथ मौके पर पहुंचकर परिजनों को शांत कराया. वहीं दोनों शवों को कब्जे में लेकर अंत्य परीक्षण हेतु मोर्चरी हाउस भेज दिया है.
इस मामले में बताया जा रहा है कि चकिया कोतवाली के मुड़हुआं दक्षिणी की गांव निवासी प्रिंस यादव की पत्नी अर्चना अपने मायके एकौना आयी हुयी थी, जहां शुक्रवार को उसको प्रसव पीड़ा होने लगी परिजनों ने आनन फानन में उसको शहाबगंज स्थित आस्था हॉस्पिटल में भर्ती कराया. यहां पर डिलीवरी के दौरान महिला व बच्चे दोनों की मौत हो गई.जैसे ही परिजनों को घटना की जानकारी मिली, वे अस्पताल पहुंच गए और लापरवाही का आरोप लगाते हुए प्रदर्शन शुरू कर दिया.इसके बाद अस्पताल की संचालक मौके से फरार हो गई.
सीओ और तीन थानों की पुलिस ने मौके पर पहुंचकर स्थिति को नियंत्रित किया. थानाध्यक्ष मिर्जा रिजवान बेग ने बताया कि मृतका के पति की तहरीर के आधार पर मामले की जांच की जा रही है. उन्होंने कहा कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट के बाद उचित कार्रवाई की जाएगी.
जनपद में धड़ल्ले से संचालित हैं अवैध हॉस्पिटल
ग्रामीणों ने बताया कि स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों की साठ गांठ से क्षेत्र में अवैध हॉस्पिटल की संख्या बढ़ती जा रही है और धड़ल्ले से अपने अस्पताल को संचालित कर रहे हैं. जहां हॉस्पिटल में कोई घटना घटित होती है तो अधिकारी जाँच की बात करते हैं. उसके बाद पैसा लेकर मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है.
अधिकारियों की अनदेखी, बिना डिग्री एवं अनुभव विहीन चिकित्सक कर रहे गंभीर बिमारियों का ईलाज
स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों की अनदेखी या मिली भगत के चलते समस्त जनपद वासियों की जिंदगी झोलाछाप डॉक्टरों के हवाले हैं. जिले में सामुदायिक और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में सुविधा नहीं होने के कारण समस्त जनपदवासी फर्जी चिकित्सकों की शरण में जाने को मजबूर हैं. जनपद के प्रत्येक क्षेत्र के गांव -मोहल्लों में ऐसे हजारों झोला छाप डॉक्टर अपनी अपनी दुकानें खोल बैठे हैं. जो सभी रोगों के ईलाज की गारंटी लेकर गरीबों मजलूमों की गाढ़ी कमाई लुट रहे हैं.
जनपद के समस्त क्षेत्रों के गावों – मोहल्लों में बिना रजिस्ट्रेशन के हजारों क्लीनिक, मेडिकल स्टोर, नरसिंह होम, पैथोलॉजी चल रहे हैं. इनमें बैठने वाले चिकित्सक हाईस्कूल या इंटरमीडिएट हैं. कई क्लीनिक ऐसे हैं जिनमें निजी महंगे अस्पतालों के एजेंट चिकित्सक बनकर बैठे हुए है. बुखार,पेट दर्द आदि आम बीमारियों की दवा वह अपने पास से देते है और हालात बिगड़ने या भंयकर बीमारी होने पर मरीज को निजी अस्पताल में भेजकर अस्पताल संचालकों से कमीशन प्राप्त करते हैं. इस कमीशन का भार मरीज पर पड़ता है.
सूत्रों का कहना है कि जनपद चंदौली में चट्टी चौराहों पर झोलाछाप डॉक्टरों का धंधा स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों की मेहरबानी से चल रहा हैं. स्वास्थ्य विभाग की ओर से आज तक इस दिशा में कोई अभियान नहीं चलाया गया हैं. इस कारण गांव गांव में अप्रशिक्षित चिकित्सकों का धंधा फल फूल रहा हैं.
झोलाछाप डॉक्टर खुलेआम चला रहे हैं अपनी दुकानें
झोलाछाप डॉक्टर मरीजों की जिंदगी के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं. ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसे झोलाछाप डॉक्टर खुलेआम अपनी दुकानें चला रहे हैं। इनके चक्कर में फंसकर हर दिन किसी न किसी मरीज को अपनी जान गंवानी पड़ रही है. एक अनुमान के मुताबिक क्षेत्र में करीब दो सौ से भी अधिक झोलाछाप डॉक्टर अपनी दुकान चला रहे हैं.
मुहिम चलाकर प्राथमिकी दर्ज करें
सूत्रों ने कहा है कि अगर समय रहते इसे गंभीरता से नहीं लिया गया तो कितने ही ग्रामीणों की गलत इलाज से जान जा रही है. हर गांव में अवैध दुकान चलाने वाले झोलाछाप डॉक्टरों के खिलाफ मुहिम चलाकर बंद कराने एवं इन पर प्राथमिकी दर्ज कर सख्त कार्रवाई करने की आवश्यकता है.
बिना लाइसेंस के रखते हैं दवाओं का स्टॉक
झोलाछाप डॉक्टरों द्वारा बिना ड्रग लाइसेंस के दवाओं का भंडारण विक्रय भी किया जाता है. लेकिन स्वास्थ्य विभाग कार्रवाई नहीं करता. इन डॉक्टरों की कमाई मौसमी बीमारियों के फैलने से अधिक होती है. मरीज चाहे उल्टी, दस्त, खांसी, बुखार से पीड़ित हो या फिर अन्य कोई बीमारी से. सभी बीमारियों का इलाज यह झोलाछाप डॉक्टर करने को तैयार हो जाते हैं. उल्टी, दस्त, बुखार जैसी बिमारियेां में वे ग्लूकोज की बोतलें चढ़ाना शुरू कर देते हैं.
झोला छाप डॉक्टरों के फलने-फूलने में रैकेट करता है मदद
झोलाछाप डॉक्टरों को नर्सिंग होम संचालकों एवं दवा दुकानदारों का पूरा सहयोग प्राप्त होता है. इन्हीं की आड़ में इस गोरखधंधा को बेखौफ अंजाम दिया जाता है. गांव हो या शहर, इस रैकेट से कोई नहीं बच पा रहा है। क्या अनपढ़ और क्या शिक्षित सभी इसके शिकार बन रहे हैं. साधारण बीमारी के इलाज के नाम पर मरीजों से दवा एवं जांच के नाम पर भारी रकम ऐंठी जाती है. बड़े-बड़े नर्सिंग होम और दवा दुकानदारों से झोलाछाप डॉक्टरों का मधुर संबंध होता है.
दर असल चौंकाने वाली बात तो यह है कि ये नर्सिंग होम और क्लिनिक चौक-चौराहों पर चल रहे हैं, जहां से तमाम अधिकारियों का आना-जाना लगा रहता है. इसके बाद भी इस ओर अधिकारी नजर नहीं उठाना चाहते. सूत्रों ने यह भी बताया है कि इस प्रकार के नर्सिंग होम, क्लिनिक तथा झोलाछाप डॉक्टरों द्वारा स्थानीय स्वास्थ्य विभाग के पदाधिकारियों और कर्मियों को बंधी-बंधाई मोटी रकम पहुंचाई जाती है, जिस कारण कोई भी स्वास्थ्य अधिकारी कार्रवाई करना ही नहीं चाहते। ये झोलाछाप डॉक्टर अपने नर्सिंग होम के नजदीक एमबीबीएस का बोर्ड लगाकर गलत ढंग से स्वयं एमबीबीएस डॉक्टर का रोल अदा कर रहे हैं।