भगवान विनाश करने नहीं, संसार को रोशन करने आते हैं – पूज्य राजनिशाचार्य जी

राम जानकी मठ मंदिर की 40वीं वर्षगांठ पर आयोजित रामकथा का संदेश केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है। पूज्य राजनिशाचार्य जी महाराज ने भगवान श्रीराम के अवतरण की व्याख्या के जरिए धर्म, मानवता और सदाचार का महत्व रेखांकित किया। उनका संदेश है कि भगवान का मार्ग विनाश नहीं, बल्कि संसार को प्रकाशवान बनाने का मार्ग है।

राम जानकी मठ की 40वीं वर्षगांठ पर मानस परायण एवं रामकथा, धर्म की रक्षा और मानवता का दिया संदेश

चंदौली। भगवान का अवतरण संसार में विनाश करने के लिए नहीं, बल्कि धर्म की स्थापना, संतों और भक्तों की रक्षा तथा मानवता को प्रकाश देने के लिए होता है। भगवान अपने लोक को आलोकित करने और पृथ्वी पर धर्म की मर्यादा बनाए रखने आते हैं। यह प्रेरक संदेश पटना से पधारे व्यास पूज्य राजनिशाचार्य जी महाराज ने राम जानकी मठ मंदिर की 40वीं वर्षगांठ पर आयोजित मानस परायण एवं रामकथा के तीसरे दिन श्रद्धालुओं को दिया।

महाराज जी ने भगवान श्रीराम के जीवन चरित्र का वर्णन करते हुए कहा कि प्रभु किसी को मारने नहीं आते, बल्कि संसार को धर्म और सदाचार का मार्ग दिखाने आते हैं। उनका अवतरण पृथ्वी पर धर्म की रक्षा और संतों-भक्तों की भक्ति को संरक्षण देने के लिए होता है। श्रीराम का जीवन मर्यादा, त्याग, प्रेम और समर्पण की ऐसी मिसाल है, जो युगों-युगों तक मानवता को सही राह दिखाती रहेगी।

सिंदूर में छिपा है भारतीय संस्कृति की शक्ति और समर्पण का भाव

कथा के दौरान पूज्य महाराज ने सिंदूर के धार्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व को भी विस्तार से समझाया। उन्होंने कहा कि सिंदूर भारतीय संस्कृति में शक्ति, प्रेम, समर्पण और अखंड सौभाग्य का प्रतीक है। प्रातःकाल भगवान भास्कर के उदय होने पर उनकी लालिमा सिंदूर जैसी दिखाई देती है। गेंदा, गुड़हल और गुलाब के पुष्पों में भी इसी रंग की आभा दिखाई देती है।

उन्होंने बताया कि भारतीय संतों ने इस रंग के वस्त्रों को अग्निवेश के रूप में अपनाया। भगवान गणेश और हनुमान जी को भी सिंदूर अर्पित किया जाता है। सनातन परंपरा में सिंदूर प्रेमबंधन, दीर्घायु, अमरता और आशीर्वाद का प्रतीक माना गया है।

रामायण केवल ग्रंथ नहीं, आदर्श जीवन जीने की मार्गदर्शिका

महाराज जी ने श्रद्धालुओं का आह्वान किया कि रामायण को केवल धार्मिक आयोजन या कथा श्रवण तक सीमित न रखें, बल्कि इसकी शिक्षाओं को अपने जीवन में उतारें। रामायण प्रत्येक व्यक्ति को धर्म, कर्तव्य, मर्यादा और मानवता का पाठ पढ़ाती है। प्रतिदिन रामायण से शिक्षा ग्रहण कर उसके आदर्शों पर चलना ही भगवान श्रीराम के प्रति सच्ची श्रद्धा है।

उन्होंने कहा कि धर्म की रक्षा केवल शब्दों से नहीं, बल्कि अपने आचरण और कर्मों से होती है। भगवान श्रीराम का चरित्र हमें दूसरों के जीवन में प्रकाश फैलाने और समाज में प्रेम, सद्भाव एवं सदाचार स्थापित करने की प्रेरणा देता है।

संतों और श्रद्धालुओं की रही उपस्थिति

कार्यक्रम का मंच संचालन संत चंद्रबली दास सोनभद्र कर रहे हैं। इस अवसर पर पंडित वशिष्ठ नारायण उपाध्याय जौनपुरी, पूज्यनीय शिया जी इंदौर, पंडित रामचंद्र मिश्र, जयशंकर द्विवेदी, हरिद्वार सिंह, शिवबच्चन सिंह, राजनारायण विश्वकर्मा, पंकज तिवारी और सुरेंद्र मिश्र सहित अनेक श्रद्धालु एवं गणमान्य लोग उपस्थित रहे।