संविधान हमारे समर्थन में है, तो व्यवस्था विरोध में क्यों?-पिंटू पाल

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संविधान को अपनाएं, व्यवस्था को सुधारें। तभी सच्चा लोकतंत्र फलेगा-फूलेगा।
बाबा साहब डॉ अंबेडकर: भारत का संविधान दुनिया का सबसे लंबा लिखित संविधान है, जो 26 जनवरी 1950 से हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था का आधार स्तंभ बना हुआ है। यह नागरिकों को मौलिक अधिकार, समानता, स्वतंत्रता और न्याय का आश्वासन देता है। लेकिन विडंबना यह है कि संविधान हमारे समर्थन में खड़ा है, जबकि सत्ता की व्यवस्था अक्सर हमारे विरोध में खड़ी नजर आती है। 

संविधान स्पष्ट रूप से नागरिकों के पक्ष में है। 
अनुच्छेद 14 से 18 तक समानता का अधिकार, अनुच्छेद 19 से 22 तक स्वतंत्रता का अधिकार, और अनुच्छेद 32 में मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए सीधे सुप्रीम कोर्ट जाने का प्रावधान—ये सब जनता को सशक्त बनाते हैं। हाल के वर्षों में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों ने इसे साबित किया है। जैसे, इलेक्टोरल बॉन्ड्स को असंवैधानिक घोषित करना या नागरिकता संशोधन कानून (CAA) पर सुनवाई—ये उदाहरण बताते हैं कि संविधान सत्ता के अतिक्रमण को रोकने का हथियार है।
यह जनता का संरक्षक है, जो किसी भी सरकार को मनमानी करने से रोकता है।
दूसरी ओर, व्यवस्था—यानी सत्ता के गलियारों में बैठे तंत्र—अक्सर जनहित के विपरीत काम करता दिखता है। भ्रष्टाचार के मामले, पुलिस का दुरुपयोग, मीडिया पर दबाव, या विपक्षी नेताओं पर लगातार जांच एजेंसियों का शिकंजा—ये सब संविधान की भावना के खिलाफ हैं। किसान आंदोलन के दौरान हुई घटनाएं या विभिन्न राज्यों में विपक्षी सरकारों पर केंद्रित कार्रवाईयां दर्शाती हैं कि व्यवस्था कैसे व्यक्तिगत एजेंडे को प्राथमिकता देती है। संविधान कहता है ‘सभी नागरिक समान’, लेकिन व्यवस्था कहती है ‘सत्ता के करीब वाले पहले’।
यह विरोधाभास लोकतंत्र के लिए खतरा है। 
जब व्यवस्था संविधान को नजरअंदाज करती है, तो जनता का विश्वास डगमगाता है। लेकिन अच्छी खबर यह है कि संविधान अभी भी जीवंत है।अदालतें, नागरिक समाज और जागरूक मतदाता इसे मजबूत रखे हुए हैं। हमें चाहिए कि हम संविधान की ओर लौटें—न कि व्यवस्था के जाल में फंसें। यह वाक्य सिर्फ नारा नहीं, बल्कि एक आह्वान है। संविधान को अपनाएं, व्यवस्था को सुधारें। तभी सच्चा लोकतंत्र फलेगा-फूलेगा।
बाबा साहब डॉ अंबेडकर ने 20 जुलाई 1942 के अपने भाषण से प्रेरित हैं, जहां उन्होंने दलित उत्थान के लिए चार मंत्र दिए, वह है शिक्षा, संगठन, संघर्ष और आंदोलन इनका उल्लेख किया। अंबेडकर के अनुसार, ये सामाजिक क्रांति की नींव हैं, जो जातिवाद और असमानता को समाप्त करने में सहायक हैं। इन्हें अपनाने से वंचित समाज सशक्त होता है।

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