सामाजिक भेदभाव और जातीय विषमताओं के कट्टर विरोधी थे संत रविदास- आचार्य राजेंद्र प्रसाद

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जाति-वर्ग से परे मानवता का दिए संदेश,गुरू पुर्णिमा पर विधि विधान से पूजन अर्चन, भंडारे में श्रद्धालुओं ने चखा प्रसाद 

चंदौली, सटीक संवाद,10 जुलाई 2025। संत रविदास जी सामाजिक भेदभाव और जातीय विषमताओं के कट्टर विरोधी थे. वे मानते थे कि व्यक्ति की पहचान उसकी जाति या कुल से नहीं, बल्कि उसके कर्मों से होती है. उन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से एक समतामूलक समाज की परिकल्पना की, जहां हर व्यक्ति समान हो. उनका प्रसिद्ध दोहा “ऐसा चाहूं राज मैं, जहां मिलै सबन को अन्न। छोट-बड़ों सब सम बसैं, रविदास रहें प्रसन्न।।” इस बात का प्रमाण है कि वे एक ऐसे समाज की स्थापना करना चाहते थे, जहां भेदभाव न हो और हर व्यक्ति समान रूप से खुशहाल जीवन व्यतीत कर सके. आने वाली पीढ़ियां उनके विचारों से प्रेरित हो.उनके जीवन, शिक्षाओं और रचनाओं को भौतिक एवं आभासी रूप में प्रदर्शित किया जायेगा. उक्त बातें गुरू पूर्णिमा के अवसर पर शहाबगंज ब्लॉक अंतर्गत खजरा गांव में सत्येआदि आश्रम के आचार्य डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा 

फोटो: आचार्य डॉ राजेंद्र प्रसाद श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए 

लॉर्ड बुद्धा डॉ अंबेडकर सेवा समिति के प्रदेश अध्यक्ष श्री अर्जुन प्रसाद आर्य ने कहा कि गुरू रविदास आश्रम में आने के बाद लोगों की जाति, धर्म और वर्ग की भावना समाप्त हो जाती है. यहां हर भक्त के मन में ‘मैं’ की भावना समाप्त होकर ‘हम’ की भावना जागृत होती है. संत रविदास के विचारों में सामाजिक समरसता और समानता को विशेष स्थान प्राप्त है. उनकी विचारधारा ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’ के रूप में भी विख्यात है, जो आडंबरों से मुक्त, स्वच्छ और सरल जीवन की ओर प्रेरित करती है. संत रविदास ने ‘बेगमपुरा’ नामक एक ऐसे आदर्श नगर की कल्पना की, जहां दुख, भेदभाव और अन्याय न हो. उनका यह दृष्टिकोण आज भी समाज में सामंजस्य स्थापित करने के लिए प्रासंगिक है.

फोटो: अर्जुन प्रसाद आर्य गुरू नीलम सत्य को माला पहनाकर पूजन करते हुए 


इस दौरान नीलम सत्य, सम्राट जी, अमरदेव, जगजीवन, घुरभारी, बाबूलाल, नथुनी, महेन्द्र, शमशेर, दीपक, मनीष, मराछू,शिवकुमारी, रणधीर, जीयूत सीताराम, विनोद, रामाश्रय, फूला, मीता, सुमन, गुड्डी, चिन्ता, विमला, गीता सहित सैकड़ों महिलाएं पुरुषों ने गुरू का दर्शन पूजन कर आशीर्वाद प्राप्त किया अंत में भंडारे में प्रसाद ग्रहण किया।

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