मा.कांशीराम बहुजन चेतना और सामाजिक न्याय के प्रखर शिल्पी थे: मायावती, महापरिनिर्वाण दिवस पर आदरांजलि, बहुजन समाज की एकता और सत्ता में भागीदारी का संदेश
मान्यवर कांशीराम जी ने बहुजन समाज को संगठित कर स्वाभिमान, सामाजिक न्याय और राजनीतिक भागीदारी की चेतना जगाई। उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि समानता, संवैधानिक अधिकारों और सामाजिक सम्मान के लिए निरंतर प्रयास करना है।
लखनऊ। बसपा प्रमुख मायावती ने शुक्रवार को पार्टी संस्थापक मान्यवर कांशीराम जी के 20वें महापरिनिर्वाण दिवस पर उन्हें आदरांजलि अर्पित की। कांशीराम जी के संघर्ष, संगठन निर्माण और बहुजन समाज को राजनीतिक शक्ति बनाने के मिशन को याद किया गया। उनका जीवन वंचित समाज में स्वाभिमान जगाने, सामाजिक असमानता को चुनौती देने और सत्ता में भागीदारी की चेतना पैदा करने के संघर्ष का प्रतीक रहा है।

BAMCEF से बसपा तक खड़ा किया बहुजन आंदोलन
15 मार्च 1934 को पंजाब में जन्मे कांशीराम जी ने सरकारी नौकरी छोड़कर अपना जीवन सामाजिक परिवर्तन के मिशन को समर्पित किया। BAMCEF के जरिए शिक्षित कर्मचारियों को जोड़ा, DS-4 से सामाजिक-राजनीतिक चेतना जगाई और 14 अप्रैल 1984 को बहुजन समाज पार्टी की स्थापना कर वंचित समुदायों को राजनीतिक मंच दिया।
उनका स्पष्ट संदेश था कि केवल संख्या में बड़ा होना पर्याप्त नहीं, संगठित होकर सत्ता और निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी हासिल करना जरूरी है। उन्होंने बहुजन समाज को अपनी ताकत पहचानने, अधिकारों के प्रति जागरूक होने और राजनीतिक रूप से सक्रिय बनने की दिशा दिखाई।
आंबेडकरवादी विचारों को संगठन से जोड़ा
कांशीराम जी के आंदोलन पर डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के विचारों का गहरा प्रभाव था। शिक्षा, संगठन, संघर्ष, समानता और संवैधानिक अधिकार उनकी विचारधारा के प्रमुख आधार रहे। उन्होंने जातिगत भेदभाव और सामाजिक वर्चस्व के सवालों को राजनीतिक विमर्श के केंद्र में लाने का प्रयास किया।

उनके लिए राजनीति केवल चुनाव जीतने का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक सम्मान, प्रतिनिधित्व और वंचित वर्गों की भागीदारी बढ़ाने का जरिया थी। उनका संघर्ष इस विचार पर आधारित था कि समाज की वास्तविक प्रगति तभी संभव है, जब हर व्यक्ति को सम्मान और समान अवसर मिले।
श्रद्धांजलि के साथ मिशन आगे बढ़ाने की चुनौती
9 अक्टूबर 2006 को कांशीराम जी का महापरिनिर्वाण हुआ। दो दशक बाद भी उनके विचार सामाजिक न्याय, बहुजन एकता और राजनीतिक प्रतिनिधित्व की बहस में प्रासंगिक हैं। उनकी विरासत केवल स्मारकों पर पुष्प अर्पित करने तक सीमित नहीं, बल्कि शिक्षा को चेतना, चेतना को संगठन और संगठन को सामाजिक परिवर्तन से जोड़ने की प्रेरणा देती है।