1818 की कोरेगांव की लड़ाई दलितों के लिए काफी अहम-शैलेश कुमार

चन्दौली। जिले के दूरस्थ बनांचल विकास खण्ड नौगढ़ के अंबेडकर पार्क में बुधवार को भीम आर्मी और आजाद समाज पार्टी के तत्वाधान में शौर्य दिवस का आयोजन किया गया. साथ ही प्रथम शिक्षिका माता सावित्रीबाई फूले जी के प्रथम पाठशाला 1 जनवरी 1948 को खोली थी जिनके संघर्षो को भी याद किया गया.
कार्यक्रम में उपस्थित बतौर मुख्य अतिथि जिलाध्यक्ष (आसपा) शैलेश कुमार सहित अन्य ने माता सावित्री बाई फुले और महार शूरवीरों के तैल चित्र पर माल्यार्पण एवं पुष्प अर्पित कर कार्यक्रम का शुरुआत किया.
वक्ताओं ने भीमा कोरे गाँव में एक जनवरी 1818 में महार रेजिमेन्ट व पेशवा बाजी राव द्वितीय के बीच हुए संग्राम में 500 महार सैनिकों ने 28000 पेशवा सैनिको को धूल चटा दिया था, के वर्णन पर विस्तार से चर्चा किया.
शैलेश कुमार ने बताया कि भीमा कोरेगांव की लड़ाई उन 500 महार शूरवीरों का इतिहास है जो कि ब्राह्मणों के आंतकवाद की चर्मसीमा दर्शाती है. 18वीं सदी में महाराष्ट्र में भीमा नदी के आस पास सबे गांव को भीमा कोरेगांव कहते हैं. वहाँ ब्राह्मण पेशवाओं ने ऊंच नीच भेदभाव का इतना आतंक फैला दिया था कि शूद्रों के गले में हांडी और पिछवाड़े पर झाड़ू बांधकर चलने पर विवश कर दिया था गले में हांडी बांधने का कारण था कि शूद्र जमीन पर न थूंके क्योंकि अगर शूद्रों की थूंक पर ब्राह्मणों का पैर पड़ जायेगा तो वह अशुद्ध हो जायेगा और उसे गंगा स्नान करने जाना पड़ेगा.
पीछे झाड़ू बांधने का कारण था कि शूद्र जहां चले तो उनके पैरों के निशान मिट जाये. क्योंकि अगर उनके पैरों के निशान पर ब्राह्मणों का पैर पड जायेगा तो वे अशुद्ध हो जायेंगे और उनको गंगा नदी स्नान करना पड़ेगा. यहां तक कि शूद्रों की परछाई पडऩे पर भी ब्राह्मण अशुद्ध हो जाता था इसलिए सुबह और सायं को शूद्रों (महारों) को घर से निकलना भी मना था. ब्राह्मणों ने छुआछूत का आतंक फैला कर शूद्रों को पशुओं से भी बदतर बना दिया था.
ब्राह्मण पेशवाओं के आतंक से शूद्र महार अंदर ही अंदर बदले की आग में जल रहे थे. महारों को सेना में भर्ती होने का अधिकार नहीं था अंग्रेज़ी सरकार ने इसका पूरा फायदा उठाया और महारों को अपनी सेना में शामिल कर लिया. शूद्र (महार) ब्राह्मण पेशवाओं से अपने अपमान का बदला लेने के लिए छटपटा रहे थे अंग्रेजी सरकार ने मौका दिया.
500 महार शूरवीरों ने 28000 पेशवा ब्राह्मणों से लड़ने के लिए 31 दिसंबर की रात्रि को 30 किलोमीटर पैदल चलकर भीमा कोरेगांव पहुंचे. 1 जनवरी 1818 को, ईस्ट इंडिया कंपनी की बॉम्बे प्रेसीडेंसी जिनमें 500 की संख्या में महार थे , पेशवा बाजीराव द्वितीय की संख्यात्मक रूप से बेहतर 28,000 सेना को हराया. मृत सैनिकों की स्मृति में अंग्रेजों द्वारा कोरेगांव में एक विजय स्तंभ बनवाया गया था.
1928 में, बाबासाहब डॉ भीमराव अंबेडकर ने यहां पहले स्मरणोत्सव समारोह का नेतृत्व किया था. तब से हर साल 1 जनवरी को अंबेडकरवादी उच्च जाति शासन के खिलाफ अपनी जीत का जश्न मनाने के लिए भीमा कोरेगांव में इकट्ठा होते हैं , जिन्हें वे अपने उत्पीड़कों के रूप में देखते हैं.1818 की कोरेगांव की लड़ाई दलितों के लिए काफी अहम है।
ब्राह्मणवादी लोग कभी भी शूद्रों (OBC, SC, ST) के साथ न्याय नहीं कर सकते हैं. इसलिए ही बाबा साहब डॉ भीमराव आंबेडकर ने 16 अक्टूबर 1956 को हिन्दू धर्म को लात मार कर बुद्ध धम्म अपनाया था और पूरे भारत को बुद्ध मय बनाने का संकल्प लिया था आज जो लोग हिन्दू बनकर नीच जाति के बने हुए हैं वे सवर्णो द्वारा अपमानित होने का इंतजार कर रहे हैं.
रामचंद्र राम(मास्टर) ने कहा कि माता सावित्री वाई फूले जी ने आज ही के दिन देश की 1848 में महिलाओं के लिए प्रथम पाठशाला खोली थी.
चन्दा देवी ने कही कि संसद (राज्य सभा) में गृह मंत्री अमीत शाह ने बाबा साहब डॉ भीम राव अंबेडकर जी का जो अपमान किया है वह क्षमा योग्य नहीं है.कार्यक्रम की अध्यक्षता रामदीन और संचालन एडवोकेट दिनेश कुमार ने किया.
इस अवसर पर श्याम सुन्दर, अवधेश कुमार भारती, दिल बहार, दिनेश कुमार, सुरेश कुमार, दर्शन गांधी (लोक गायक), डा. कुरील, कुलदीप, अशोक कनौजिया, महेश, बनवारी, अश्विनी कुमार, प्रदीप वैद्य, सुभाष, राजकुमार, सुकालू, सूपा भगत, चन्द्रभान सिंह, चन्द्रभान सहित सैकड़ों महिला पुरुष और बच्चें मौजूद रहे।