डॉ. अम्बेडकर की जयंती: कर्मकांड नहीं, विचारों और संघर्ष का संकल्प लें – अजय राय

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विचारों को अपनाकर ही इनके सपनों को साकार कर सकते हैं।

चकिया,चंदौली,14 अप्रैल 2026: डॉ. भीमराव अम्बेडकर की 135वीं जयंती पर चकिया के शहाबगंज में आयोजित गोष्ठी ने एक महत्वपूर्ण संदेश दिया। आईपीएफ राज्य कार्य समिति सदस्य अजय राय ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि हम अम्बेडकर जयंती को कोई कर्मकांड या मूर्तिपूजा के रूप में नहीं मनाते, बल्कि उनके क्रांतिकारी विचारों पर चिंतन, सामाजिक कर्मों की समीक्षा और संघर्ष के नए संकल्प के लिए समर्पित करते हैं।

अजय राय ने गोष्ठी को संबोधित करते हुए जोर देकर कहा, “डॉ. अम्बेडकर, शहीदेआजम भगत सिंह और महात्मा गांधी जैसे महान व्यक्तित्वों को अगर मंदिरों में बिठाकर उनकी पूजा करने लगें, तो उनके अमूल्य विचार धूमिल हो जाएंगे। मूर्तियों की जगह उनके सिद्धांतों को अपनाएं और उनके संघर्ष के पथ पर चलें।” यह बयान न केवल जयंती के सच्चे स्वरूप को रेखांकित करता है, बल्कि आज के सामाजिक परिवेश में प्रासंगिक भी है।
अम्बेडकर के विचार: आज भी प्रासंगिक क्रांति
डॉ. बी.आर. अम्बेडकर, जिन्हें ‘भारतीय संविधान के जनक’ कहा जाता है, ने दलितों और शोषित वर्गों के उत्थान के लिए जीवनभर संघर्ष किया। 1891 में जन्मे अम्बेडकर ने 1956 में लाखों अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म अपनाकर जातिवाद के खिलाफ ऐतिहासिक विद्रोह किया। उनके प्रसिद्ध नारे ‘शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो’ ने करोड़ों लोगों को प्रेरित किया।
अजय राय का मतलब यही था कि जयंती पर मंदिर-मूर्ति बनाने के बजाय इन विचारों को जीना चाहिए। उदाहरणस्वरूप, महाराष्ट्र के महाड़ सत्याग्रह (1927) में अम्बेडकर ने दलितों को सार्वजनिक जलाशय का अधिकार दिलाया, जो आज भी जल-संघर्षों की प्रेरणा है।
भगत सिंह और गांधी: पूजा नहीं, पथ का अनुसरण
अजय राय ने भगत सिंह और गांधी का जिक्र कर एक गहरा संदेश दिया। भगत सिंह ने 23 साल की उम्र में ‘इंकलाब जिंदाबाद’ के नारे के साथ फांसी पर चढ़कर ब्रिटिश साम्राज्य को चुनौती दी। वहीं, गांधी ने अहिंसा से स्वतंत्रता दिलाई। लेकिन अगर इनकी मूर्तियों को मंदिरों में पूजने लगें, तो उनका बलिदान व्यर्थ हो जाएगा। राय का कहना सटीक है—विचारों को अपनाकर ही इनके सपनों को साकार कर सकते हैं।
यह आयोजन आईपीएफ की सामाजिक जागरूकता अभियान का हिस्सा था, जिसमें दर्जनों कार्यकर्ताओं ने भाग लिया। अजय राय ने अंत में संकल्प लिया कि डॉ. अम्बेडकर के विचारों से प्रेरित होकर जातिवाद, असमानता और शोषण के खिलाफ निरंतर संघर्ष जारी रखेंगे।

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