सबसे सस्ता मजदूरों का जान: मुगलसराय में एक और त्रासदी, सुरक्षा की अनदेखी से गई जान

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चंदौली के मुगलसराय जीटी रोड पर अतिक्रमण हटाओ और सड़क चौड़ीकरण अभियान के नाम पर चली तोड़फोड़ में एक मजदूर की मौत, एक की गंभीर चोट—यह कोई अनजान दुर्घटना नहीं, बल्कि दीर्घकालिक प्रशासनिक लापरवाही और कार्यस्थल सुरक्षा की अनदेखी का परिणाम है। वाराणसी के बजरडीहा निवासी मोहम्मद अली (लगभग 35 वर्ष) गिरती दीवार के मलबे में दब गए और अस्पताल ले जाते ही चिकित्सकों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। दूसरा मजदूर गंभीर रूप से घायल है, उसका इलाज जारी है।



सुरक्षा की पूर्ण अनुपस्थिति: लापरवाही साफ़ दिख रही है
घटना की प्राथमिक जानकारी से स्पष्ट है कि बिना अनुमति बनी दुकानों और चबूतरों को तोड़ा जा रहा था ताकि सड़क चौड़ीकरण का काम सुचारू हो सके। लेकिन स्थानीय लोगों और मृतक के परिजनों के आरोप गंभीर हैं: तोड़फोड़ के समय कोई सुरक्षा प्रबंध नहीं था। भारी मशीनों और कर्मियों के बीच—बैरिकेडिंग नहीं थी, कोई रसीद-सूचना नहीं दी गई, सुरक्षा गार्ड नहीं थे, मजदूरों को सुरक्षा उपकरण (हेलमेट, ग्लव्स, वेस्ट) नहीं दिए गए। यह सब साफ़ कर देता है कि कार्यस्थल सुरक्षा के मानकों को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया।

प्रशासनिक तनाव और जांच के निर्देश
हादसे के बाद स्थानीय अधिकारी मौके पर पहुंचे, परिजनों को अनुग्रह राशि देने और घायल मजदूर के बेहतर उपचार का आश्वासन दिया। जिलाधिकारी ने हादसे की जांच के निर्देश दे दिए हैं ताकि यह स्पष्ट हो सके कि जिम्मेदारी ठेकेदार की है या प्रशासनिक लापरवाही के कारण यह त्रासदी हुई।

परिजन और ग्रामीण न्याय की मांग कर रहे हैं
परिजन और ग्रामीण न्यायोचित मुआवजे और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग कर रहे हैं। यह घटना सड़क चौड़ीकरण जैसे सार्वजनिक कार्यों में कार्यस्थल सुरक्षा के मानकों की अनदेखी को उजागर कर देती है। जांच रिपोर्ट के आधार पर आगे की कानूनी और दंडात्मक कार्रवाई होगी, प्रशासन ने त्वरित निष्पक्ष छानबीन का आश्वासन दिया है।

“सबसे सस्ता मजदूरों का जान”—यह कहानी पुरानी नहीं, बल्कि बार-बार दोहराई जाने वाली सच्चाई है।
मुगलसराय में हुई यह त्रासदी केवल एक दुर्घटना नहीं, बल्कि एक सामाजिक न्याय का प्रश्न है। जब मजदूरों की जानों की रक्षा के लिए न तो बैरिकेडिंग होती है, न सुरक्षा उपकरण, न सूचना—तब हमें यह कहने का अधिकार है कि “सबसे सस्ता मजदूरों का जान” केवल एक कहावत नहीं, बल्कि हमारी वास्तविकता है।
क्या जरूरी कदम हैं?

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