सावित्री बाई फुले ने महिलाओं के अधिकारों के लिए जीवन भर संघर्ष किया- घनश्याम प्रधान

उनका जीवन महिलाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है, उनके पग चिन्हों पर चलने का संकल्प दिलाया
चंदौली। जिला मुख्यालय स्थित अंबेडकर नगर में बसपा कार्यकताओं ने भारत की प्रथम महिला शिक्षिका सावित्री बाई फुले की जयंती हर्षोल्लास के साथ मनाया. साथ ही उनके जीवन संघर्षों पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए बालिकाओं को शिक्षा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनने की प्रेरणा दी और उनके पग चिन्हों पर चलने का संकल्प लिया.
बसपा जिलाध्यक्ष घनश्याम प्रधान ने बताया कि सावित्रीबाई फुले ने महिलाओं के अधिकारों के लिए जीवन भर संघर्ष किया. उनका जीवन महिलाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है.
सावित्रीबाई फुले का जन्म 3 जनवरी, 1831 को महाराष्ट्र के सतारा जिले के नयागांव में एक दलित परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम खन्दोजी नैवसे और माता का नाम लक्ष्मी था.सावित्रीबाई के जन्मदिन को बालिका दिवस के रूप में मनाया जाता है.
सावित्रीबाई भारत की पहली महिला शिक्षिका थीं. उन्होंने अपने पति ज्योतिवा राव फुले के साथ मिलकर लड़कियों के लिए स्कूल खोला था. उन्होंने समाज के बहिष्कृत लोगों और लड़कियों को शिक्षा देने में अहम भूमिका निभाई. सावित्रीबाई ने अस्पृश्यता, सती प्रथा, बाल विवाह, और शिक्षा प्रणाली में सामाजिक भेदभाव के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई.
उन्होंने महिलाओं के मुंडन के ख़िलाफ़ आंदोलन चलाया. सावित्रीबाई ने अंतरजातीय विवाह को बढ़ावा देने के लिए कई कदम उठाए. सावित्रीबाई ने ज्योतिराव फुले के निधन के बाद उनका अंतिम संस्कार किया था. यह काम आम तौर पर पुरुष करते हैं. सावित्रीबाई ने प्लेग महामारी के समय लोगों की मदद की थी. प्लेग से पीड़ित बच्चों की देखभाल करते समय उन्हें भी प्लेग हो गया और 10 मार्च, 1897 को उनका निधन हो गया.
अंत में कार्यक्रम में उपस्थित बहुजन सिपाहियों को उनके पग चिन्हों पर चलने का संकल्प दिलाया. साथ ही जिले के सभी से गांवों में सावित्री बाई फुले की जयंती हर्षोल्लास से मनाने का आवाहन किया.
इस अवसर पर सुभाष चंद्र, विनोद कुमार, तिलकधारी बिंद, होरीलाल, डॉ. सुनील कुमार गगन, उमापति, सुजीत कुमार, राम अवतार, अर्चना, शीला गुप्ता, उर्मिला, पूजा देवी अनीता देवी ,चमेली देवी, शम्मी देवी, संजू देवी, रीना देवी, भागीरथी देवी, रंजना देवी, मौजूद रहे।