धम्म चक्र परिवर्तन दिवस सामाजिक समानता और आत्मसम्मान की ऐतिहासिक क्रांति: अर्जुन प्रसाद आर्य
लॉर्ड बुद्धा डॉ. अंबेडकर सेवा समिति के प्रदेश अध्यक्ष अर्जुन प्रसाद आर्य ने धम्म चक्र परिवर्तन दिवस पर देश के शोषित, वंचित और दबे-कुचले वर्गों से बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर के विचारों को अपनाने तथा उनके सामाजिक परिवर्तन के आंदोलन को आगे बढ़ाने का आह्वान किया। उन्होंने शिक्षा, संगठन, सामाजिक एकता और संवैधानिक मूल्यों को समतामूलक समाज के निर्माण का आधार बताया।
चंदौली। जिले के सकलडीहा बाजार निवासी एवं लॉर्ड बुद्धा डॉ. अंबेडकर सेवा समिति के प्रदेश अध्यक्ष अर्जुन प्रसाद आर्य ने धम्म चक्र परिवर्तन दिवस के अवसर पर देश के दबे-कुचले, शोषित और वंचित वर्गों से बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर के विचारों को आत्मसात करने तथा उनके सामाजिक परिवर्तन के आंदोलन को आगे बढ़ाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि धम्म चक्र परिवर्तन दिवस केवल धर्म परिवर्तन की ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि सामाजिक समानता, आत्मसम्मान और मानवीय गरिमा की स्थापना का प्रतीक है।

अर्जुन प्रसाद आर्य ने कहा कि 14 अक्टूबर 1956 को नागपुर की दीक्षाभूमि में भारत रत्न बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर ने आज ही के दिन लाखों अनुयायियों के साथ 22 प्रतिज्ञाओं की सामूहिक बौद्ध धर्म की दीक्षा ग्रहण की थी। उनका यह ऐतिहासिक निर्णय जातिगत भेदभाव, सामाजिक असमानता और छुआछूत के विरुद्ध संघर्ष का महत्वपूर्ण पड़ाव बना। बाबा साहब ने अपने विचारों और कार्यों के माध्यम से समाज के वंचित वर्गों को अधिकारों के प्रति जागरूक होने, शिक्षा प्राप्त करने और सम्मानपूर्वक जीवन जीने की प्रेरणा दी।
उन्होंने कहा कि बाबा साहब का जीवन संघर्ष, ज्ञान और सामाजिक न्याय के प्रति अटूट प्रतिबद्धता का उदाहरण है। उन्होंने ऐसी सामाजिक व्यवस्था की परिकल्पना की, जिसमें किसी व्यक्ति के साथ जाति, जन्म या सामाजिक स्थिति के आधार पर भेदभाव न हो। प्रत्येक व्यक्ति को समान अधिकार, सम्मान और आगे बढ़ने के अवसर मिलें। धम्म चक्र परिवर्तन दिवस इसी विचारधारा को समझने और उसे व्यवहार में उतारने का अवसर प्रदान करता है।
शोषित और वंचित समाज को एकजुट होने का आह्वान
अर्जुन प्रसाद आर्य ने देश के दबे-कुचले, शोषित और वंचित वर्गों से अपील की कि वे बाबा साहब के विचारों को केवल स्मरण करने तक सीमित न रखें, बल्कि उनके सामाजिक परिवर्तन के आंदोलन को आगे बढ़ाएं। उन्होंने कहा कि शिक्षा, संगठन और संघर्ष के मार्ग पर चलकर ही समाज में व्याप्त असमानता और भेदभाव को चुनौती दी जा सकती है।
उन्होंने कहा कि सामाजिक अधिकारों के प्रति जागरूकता, शिक्षा का प्रसार और आपसी एकता किसी भी समाज की प्रगति के प्रमुख आधार हैं। वंचित वर्गों को अपने बच्चों की शिक्षा पर विशेष ध्यान देना चाहिए और नई पीढ़ी को बाबा साहब के संघर्ष, संविधान निर्माण में उनके योगदान तथा सामाजिक न्याय के विचारों से परिचित कराना चाहिए।
बुद्ध के विचारों में मानवता और करुणा का संदेश
समिति के प्रदेश अध्यक्ष ने कहा कि भगवान बुद्ध की शिक्षाएं करुणा, मैत्री, अहिंसा और विवेक का मार्ग दिखाती हैं। बाबा साहब ने बौद्ध धर्म स्वीकार कर इन मानवीय मूल्यों को अपने जीवन और सामाजिक आंदोलन से जोड़ा। उनका उद्देश्य ऐसी सामाजिक चेतना को मजबूत करना था, जिसमें मनुष्य की गरिमा और समानता को सर्वोपरि स्थान मिले।
उन्होंने कहा कि आज भी समाज को जातिगत भेदभाव, छुआछूत और ऊंच-नीच की मानसिकता से बाहर निकलने की आवश्यकता है। किसी व्यक्ति का मूल्यांकन उसकी जाति के आधार पर नहीं, बल्कि उसके ज्ञान, कर्म और मानवीय व्यवहार के आधार पर होना चाहिए। समाज में परस्पर सम्मान, भाईचारे और संवैधानिक मूल्यों को मजबूत करना ही बाबा साहब के विचारों को आगे बढ़ाने का सार्थक मार्ग है।
शिक्षा और संवैधानिक मूल्यों से होगा सामाजिक परिवर्तन
अर्जुन प्रसाद आर्य ने युवाओं से विशेष रूप से आह्वान किया कि वे शिक्षा को अपनी प्राथमिकता बनाएं, वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाएं और संविधान में निहित न्याय, स्वतंत्रता, समानता तथा बंधुत्व के मूल्यों को समझें। उन्होंने कहा कि जागरूक नागरिक ही अपने अधिकारों और कर्तव्यों को बेहतर ढंग से समझ सकता है तथा समाज में सकारात्मक परिवर्तन ला सकता है।
उन्होंने कहा कि धम्म चक्र परिवर्तन दिवस पर हमें यह संकल्प लेना चाहिए कि किसी भी व्यक्ति के साथ भेदभाव नहीं करेंगे और समानता एवं मानवीय गरिमा के पक्ष में खड़े रहेंगे। बाबा साहब के विचारों को जन-जन तक पहुंचाना, सामाजिक एकता को मजबूत करना और वंचितों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करना सामूहिक जिम्मेदारी है।
अर्जुन प्रसाद आर्य ने कहा कि बाबा साहब के संघर्ष और विचारों से प्रेरणा लेकर ही एक न्यायपूर्ण, शिक्षित और समतामूलक समाज की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है। धम्म चक्र परिवर्तन दिवस का वास्तविक संदेश भी यही है कि मानवता, समानता और आत्मसम्मान को जीवन का आधार बनाकर सामाजिक परिवर्तन के आंदोलन को निरंतर आगे बढ़ाया जाए।